Monday, August 24, 2026

माँ


हर खुशी का पल है माँ
हर दर्द की दवा है माँ
हर जिद की कोशिश माँ है
हर सपनों की उड़ान भी है माँ।

बचपन में माँ का दुलार आप हो
माँ की आँगन की खुशियाँ आप हो
जवानी में माँ के लाडले हो आप
माँ के दिल की धड़कन भी आप हो।

आपकी पढ़ाई, नौकरी के लिए
माँ सब कुछ त्यागती है
और सबसे झगड़ के भी वो
आपको विदेश भेजती है।

इस में उसकी क्या गलती है
वो आज भी आपका इंतज़ार करती है
बरसों से बहू, पोते को देखने की
आरजूं जो रखती है।

आप नहीं आवोगे
उसे पता है मगर
आप ही से उम्मीद लगाये रखती है
क्योंकि माँ तो आखिर माँ होती है।
फिर भी माँ तो आखिर माँ ही होती है l

-सुनिल जगदाळे

Thursday, December 11, 2025

जिंदगी एक जंग है


जिंदगी एक जंग है, हर दिन नई लड़ाई,

कभी खुशियों की धारा, कभी ग़मों की स्याही।

हर कदम पर चुनौतियाँ, हर मोड़ पर डर,

फिर भी बढ़ते जाना है, यही है संघर्ष का सफर।

 

आंधियाँ आती हैं, रास्ते कांटने होते हैं,

वक्त भी जब रूठे, उम्मीदें टूटती हैं।

पर जब जज्बा मजबूत हो, दिल में हो साहस,

हर मुश्किल आसान लगे, जब आप करे प्रयास।

 

हार और जीत तो बस एक क़िस्सा है,

निश्चय और आत्मविश्वास का हिस्सा है।

जो गिरकर फिर उठे, वही असली योद्धा है,

जिंदगी की जंग में वही सच्चा देवता है।

 

धैर्य से जीतें हम, कभी न हारें,

खुद से सच्चे रहें, कभी न झुके, कभी न डरे।

जिंदगी एक जंग है, ये हमें समझना होगा,

खुद से प्यार करना होगा, और आगे बढ़ना होगा।

 

Friday, November 7, 2025

अलविदा

 

नयेँ युवाओंकी भर्ती हो रही है

क्यूंकी दरम्यान ज्यादा निवृत्ती हो रही है.  


पिता के कंधो का बोझ

बेटा संभालने आ रहा है

क्यूंकी अब पिता थक रहा है

और बच्चा जवान हो रहा है.  


हजारों करोड़ की कंपनी को

अब युवा संभालेगा

बढोंको सम्मानित कर अलविदा कहेगा

और अपने कर्तव्योंको पूरा करेगा.


हर मुकाम हासिल करो आप

जो हासिल करना चाहते हो

लेकिन गलत काम कभी मत करना

जिससे दुनिया में शर्मिंदा होते हो.


एक गुजारिश करता हूँ

हो सके तो सुन भी लेना

हालात कैसे भी आए सह लेना

लेकिन कार्यालयों मे मिल-जुलकरही रहना.


Wednesday, July 23, 2025

सौ साल न्यु इंडिया के

चलते चलते युंही, ये हम कहाँ आ गये

सौ साल न्यु इंडिया के पूरा हम कर गये..


आसान नही था चलना, लाखों की भीड में

नंबर एक परही रहना था,  न्यू इंडिया के तकदीर में

दिन ब दिन प्रगती के हर शिखर पर चढ गये

सौ साल न्यु इंडिया के पूरा हम कर गये..


बाढ हो या भूकंप सबको हमने झेला है

हर मुसीबत में न्यू इंडिया ने, हम सभीको संभाला है

उतार-चढाव की हर सीढी पार करते गये

सौ साल न्यु इंडिया के पूरा हम कर गये..


बीमा क्षेत्र मे न्यू इंडिया ने, हर पढाव पार किया है

डिजिटल जमाने में, तकनीक क्षेत्र में भी बदलाव किया है

वक्त के साथ साथ, हम भी बदलते गये

सौ साल न्यु इंडिया के पूरा हम कर गये..


क्यू ना आगे भी, एक साथ जुटे रहें

न्यू इंडिया हमारा है, अभिमान से कहते रहें

सालोंतक सबको, खुशिया बाँटते जायें

दो सौ साल न्यु इंडिया के पूरा हम करते जायें..


सुनील जगदाले

मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय -२

Tuesday, September 26, 2023

सबका हिसाब होगा...

 बचपनमें खेल कुदने का 

छोटी छोटी चीजों से खुशियाँ बाटने का 

सर पे जुनून लेकर चलने का ,  

सबका हिसाब होगा.... 


जवानी मे बिनधास्त रहने का 

दुनिया से लडने का, पंगे मे पडने का 

जजबा...कुछ कर दिखाने का 

अपने प्यार को पाने का 

सबका हिसाब होगा ... 


कुछ कमाने का, कुछ गवाँने का 

कुछ देने का, कुछ लेने का 

कुछ बताने का, कुछ सुनने का

कुछ समझने का, कुछ समझाने का

कुछ ना करने का, कुछ करने का 

सबका हिसाब होगा


कुछ खोने का, कुछ पाने का 

कुछ साथ ले जाने का, कुछ छोड देने का

कुछ अच्छाई का, कुछ बुराई का 

कुछ अपनों का, कुछ सपनो का 

सबका हिसाब होगा 


कुछ छुटने का, कुछ लूटने का 

कुछ धर्म का, और अपने कर्म का 

सबका हिसाब होगा...

Thursday, March 30, 2023

कृष्णा ..... एक मित्र

 क्षणाक्षणाला आठवण येते कृष्णा

असा कसा सोडून गेलास रे.....


दुखणं खूपणं होतं काही, 

कुणालाच का बोलला नाहीस रे.....

असा कसा सोडून गेलास रे...... 


ओस पडला तुझा मित्रपरिवार 

तुझ्या विना करमत नाही रे.....

असा कसा सोडून गेलास रे...... 


विश्वास कसा ठेवू? तू आमच्यात नाहीस यावर

प्रत्येकाच्या मनात तू घर केलेस रे.....

असा कसा सोडून गेलास रे...... 


आठवणींच्या विश्वात टाकून आम्हाला

स्वतः मात्र फरार झालास रे..... 

असा कसा सोडून गेलास रे...... 


खुप आठवण येते तुझी 

आतातरी परत ये रे ...... 

कृष्णा लवकर परत ये रे.......


- सुनिल जगदाळे (२२ मार्च १०ः३०) 

Monday, February 27, 2023

दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है

मन में विचार,  चेहरे पे मुस्कान 
खुला दिल, खुला आसमान 
हर लम्हा आपका, खुशी सें है 
दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है ।

वो बात कुछ और थी, ये बात कुछ और है 
वो जमाना कुछ और था, ये जमाना कुछ और है 
दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है ।

अपनों के साथ, दुसरों का भी हाल पूछते है 
जिनसे पहचान नहीं, उन्हें भी सवालात पूछते है 
बात बनें ना बनें, मुलाकात जरूर करते है
दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है ।

सोच में रहते है वो सदा, सवाल के जवाब पर 
मुख पढ लेते है कभी-कभी, सोचने के आधार पर
हम चाहतें है वो जवाब लेकिन जवाब मिलता कुछ और है 
दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है ।

60 साल के हो गये, लेकिन सोलह जैसे रहते है
मिल-जुलकर रहना, यही उनकी आदत है 
इसलिये तो शायद उनका, इतना बडा परिवार है 
दिनेश सर की तो, बात ही कुछ और है .. ।।

Wednesday, May 12, 2021

यातना आणि याचना

आज-काल मिडीयावर विरंगुळा कमी 

आणि श्रद्धांजली जास्त वाचावी लागते,

अशी बातमी वाचताना मग, 

आपलेही काळीज थरथरते. 


कुणी गावाकडचे, तर कुणी शहराकडचे

कधी इकडचे, तर कधी तिकडचे

कोण नात्यातले, तर कोण ऑफिसातले, 

वेळ खराब असेल, तर आपल्याच घरातले. 


काळजात धस्स होते, हे सगळे ऐकून

कुठे गेला देवा आम्हां, एकट्याला टाकून

एकदा असेच अचानक, माझेही डोळे पाणावले, 

कोरोनाच्या या महामारीत, जेव्हा माझेच मी गमावले. 


नकोय ते दु:ख, नकोय त्या यातना, 

थांबव सर्व महामारी, हीच देवा प्रार्थना, 

पुरे झाले मृत्यू तांडव, आता तरी धाव रे 

कर काहीतरी चमत्कार, आणि वाचव शहरें, गाव रे. 

 

- सुनिल जगदाळे

Wednesday, April 21, 2021

कोरोना से डरो और खुद से प्यार करो

क्यूं इंतजार करें, कोई अपना गुजर जाए ? 
क्या हमसें होगा नहीं, वक्त से पहले सँवर जाएं ? 

क्या कोरोना उच-नीच देखता है ? 
या अमीर-गरीब देखता है ? 
बडा-छोटा देखता है, 
या ताकतवर देखता है? 

कोरोना ये सब नही देखता
ना ही कोई बडा-छोटा देखता है 
कभी भी, किसी को भी हो सकता है... 

तो आप अपने आपको क्यूं फँसा रहे हो... 
मालूम होते हुए भी, क्यूं मौत के पास जा रहे हो.. 

तुम्हें क्यूं लगता है  की, मुझे कुछ नही होनेवाला 
ये कोरोना- बिरोना मुझे नहीं छुंनेवाला
और ना ही मैं उससे डरनेवाला
ऐसा करके आपको भी, क्या है मिलने वाला ? 

वो भले ही एक छोटासा विषाणू है
जाने अंजाने में शरीरमें घुस जाता है
फिर अपने साथ- साथ सभीको खतरा होता है
और देखते ही देखते अापकी जान लेता है. 

फिर किस को बताओगे, मैं मास्क नही पहनता ? 
फिर किसको दिखाओगे, मैं घरमें नही बैठता ? 
कूछ पल जीना चाहते हो, तो नियमोंका पालन करो, 
कोरोना से डरो और अपने आपसें प्यार करो ... 

 कवी - सुनील जगदाले

Sunday, August 18, 2019

तुझी आठवण

तुझी आठवण

तुझ्या असण्याने मला फरक पडत नव्हता
तुझ्या नसण्याने मला फरक पडतोय,
तुझ्या वाट्याचे घरकाम मला करावं लागतंय
म्हणून नव्हे तर
तुझ्या नसण्याच्या वियोगाने आज मी रडतोय...

तू खुश असशील माझ्याविना
की माझी किरकिर बंद झाली,
पण तुला कुठे माहित आहे
तुझ्या आठवणीने माझी आसवं बेधुंद झाली..


श्रावण आणि मोबाईल


श्रावण आणि मोबाईल

श्रावणातल्या सरी येऊन मोबाईल माझा भिजेल का?
फेसबुक, व्हाट्सअप बंद होऊन मिडीया मला विसरेल का?

मोबाईल आले हातात सर्वांच्या ग्रंथ कुणी वाचेल का?
जुन्या आपल्या संस्कृतीला उजाळा कुणी देईल का ?

पिझ्झा, बर्गर च्या जमान्यात उपवास कुणी करेल का?
सोळा सोमवार व्रत नाही निदान श्रावणी सोमवार तरी होईल का?

विज्ञान-तंत्रज्ञानाच्या धावत्या युगात क्षणभर कुणी थांबेल का?
श्रावण महिन्यातल्या भक्तीसाठी मोबाईल कुणी बंद ठेवेल का?

- सुनिल जगदाळे

Friday, July 20, 2018

बूँद



मैं बूँद हूँ पानी की, यहाँ मेरी है हुकूमत ॥

एक बूँद से कभी मोती बन जाती हूँ,
लाखों बुंदों से मुसीबत नजर आती हूँ ॥

हर किसी को होती है मेरी जरूरत,
आसान नहीं मेरी इबादत


झरने में दिखी तो सुंदर लगती हूँ,
समुंदर में क्रोधित हो जाती हूँ,

खुशी और गम के साथ,
कभी आँसू बन जाती हूँ ॥


एक साथ जुड़ जाती हूँ,
तो कहर बन जाती हूँ

किसी गरीब किसान की भी,
जान ले लेती हूँ ॥


कहीं ज्यादा कहीं कम,
यही है मेरी हकीकत

मैं बूँद हूँ पानी की, यहाँ मेरी है हुकूमत ॥ ॥

Monday, November 13, 2017

लेकराची हाक

लेकराची हाक

माझ्या लेकराची हाक
माझ्या कानी ऐकू आली
एका हाकेमंदी आई
तुझी वेड़ीपिसी झाली ।

काय लेकराचा थाट
सांगू कुणा-कुणापाशी
मोठा सायब होऊन
आला गावाच्या हो वेशी ।

मन तीळ तीळ तुट
ओठ बोलू लागलं
वाट पाहून लेकरा
माझं डोळ आटलं ।

ज्यानं तुला शिकवाया
शेत गहाण टाकलं
कर्जापोटी तुझ्या बानं
सारं जग हे सोडलं ।
सारं जग हे सोडलं ।।

मंजु (एक माणूस)

मंजु (एक माणूस)

आज त्या कॅन्टीनवाल्या “मंजू”ची आठवण झाली.
कारणही तसेच होते की,
बाजूलाच एक कॅन्टीनबॉय लेडीजशी वाद घालत होता.
मग ते दिवस आठवले.
मंजूच्या विचार आणि आचाराला
सलाम करावासा वाटतो.
त्याने कॅन्टीनबॉयना गुणकारी शिकवण देऊन
शिक्षणातही अग्रगण्य केले आहे.
दिवसा कॅन्टीन- रात्री शिक्षण हे त्यांचे गणित.
मंजु हा एक कॅन्टीनचालक असुनसुद्धा
न्यू इंडिया सेंटरला तो घरचा मेंबर वाटतो.
त्यातच त्याचे स्वादिष्ट पदार्थ,
30*40 मुलांची फौज आणि त्यांची कौतुकास्पद वागणुक.
त्याने केलेल्या संस्काराची परतफेड
ही मुले कशी करणार ? देवास ठाऊक.. .

मंजूच्या कॅन्टीनमधील
सर्व पदार्थांचा आस्वाद घ्यायला
आजही लोक परत परत सेंटरला येतात.
मंजु, तुझ्या या कारकीर्दीला आणि संस्कृतीला
दुरावलेल्या आम्हा सर्वांचा मानाचा सलाम.

तुझ्या हातून पिढ्या घड़तायत
याचा आम्हाला सार्थ अभिमान आहे.
- कवी सुनील जगदाले (एक खादाड)

Thursday, March 16, 2017

गीत

गीत

दूवाँओं से कह दो,
थोड़ी दुवाभी हमें दे दो ॥

दो पल के लिए, थोड़ी खुशी दे दो ॥

इस ज़िंदगानी के लिए, थोड़ी बंदगी दे दो ॥

इन्सानियत के लिए, थोड़ी मगरूरी दे दो ॥

ऐसा न था मैं

ऐसा न था मैं

ऐसा न था मैं, अलग, अकेला रहनेवाला ।। धृ ।।

खुली आंखों से अन्याय देख,चुपकर सहनेवाला ।। 1 ।।

सरेआम गुंडा-गर्दी देख, नजरें झुकानेवाला ।। 2 ।।

लाखों, करोड़ों की भीड़ में, खुदको छुपानेवाला ।। 3 ।।

आपत्तिजनक समय पर, संकट से भागनेवाला ।। 4 ।।

बेदर्दी आवाजें सुनकर, अनसुना करनेवाला ।। 5 ।।

इस दुनिया में शर्मिंदगीसे, झुककर जीनेवाला ।। 6 ॥

ऐसा न था मैं, अलग, अकेला रहनेवाला....

मैं इंसान हूँ

मैं इंसान हूँ

मैं इंसान हूँ
जीता जागता श्मशान हूँ ॥धृ॥

आंखे बंद करके मैं चलता हूँ
किसिकी आवाज मैं न सुनता हूँ ॥1॥

बेबसी, लाचारी मेरी कमजोरी है
सच्चाई से मुँह फेर लेता हूँ ॥2॥

जैसे जिंदगी भीख में मिली है
दुनिया से मैं कहता हूँ ॥3॥

हैवानों मे रहनेवाला
मैं भी एक जानवर हूँ ॥4॥

Tuesday, September 22, 2015

हिन्दी

हम तो यूं ही घबरा गए थे, कवि सम्मेलन के नाम पर
हमें क्या पता था, यूं ही लोग हँसेंगे हम पर।

हिन्दी पखवाड़े का, एक ऐसा मौका आया
और हमने कवियोंका दरवाजा खटखटाया।

एक-दो करके हम, जमा कर रहे थे कवियोंकों
यहाँ तो पूरा कवियोंका मेला हो आया।

सोचा की एक रोज, मैं भी कवि बन जाऊँ
इनसे दो-चार लप्ज सीखके, टी वी में झलक दिखलाऊं।

पर ये होने से पहले, मुझे एक सपना आया
आप कहें तो मैं, पहले वो सपना बताऊँ।

हुआ यूँ कि मेरे सपने में आयी हिन्दी भाषा
वही हिन्दी जो है देश की राष्ट्रभाषा और हमारी आशा।

वो बोली मुझसे, की घबराना नहीं मेरे दोस्त
मै इसलिए आयी हूँ, कि खत्म कर दूँगी भाषा की निराशा।

पढ़ना, लिखना सब हिन्दी में हो जाएगा
और देखना एक दिन, अंग्रेज़ी का नामोनिशान मिट जाएगा।

Tuesday, August 25, 2015

मोबाईल


हमने बचपन में मोबाईल नहीं देखा था

तब हम नजरों से बात करते थे

आप अभी उंगलियों से नचा रहे हो....

तब हम इशारों पर नाचते थे



हमको आपका ये मोबाईल नहीं भाता

क्योंकि ना तो ये खुद चार्ज रहता

और ना ही हमें रहने देता





माना कि तकनीक का जमाना है

लेकिन माँ बाप साथ ना हों

तो ये सब किसलिए कमाना है



मेरी एक दरख्वास्त है भगवान तुझसे

की कोई मोबाइल को भूलेगा चला लेना...

लेकिन माँ बाप को कभी भुलने ना देना......